सिंध की सफलता का पर्याय सिर्फ श्रीमंत

मध्यप्रदेश ब्यूरो कृष्ण कुमार गुप्ता

शिवपुरी@न्यूज़-विगत वर्षों में सिंध का नाश हो गया था और 2017 से पहले तक सबने यह मान भी लिया था कि सिंध शिवपुरी के लिए एक ऐसा सपना है जो कभी पूरा नहीं होगा। 2017 से पहले इसलिए क्योंकि इसी समय श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया ने खुद व खुद आगे आकर यह संकल्प लिया कि मैं शिवपुरी में सिंध लाऊंगी! हाल ही में उन्होंने फिर संकल्प उठाया कि मैं शिवपुरी के घर घर में नलों की टोंटियों से पानी पहुंचाऊंगी। श्रीमंत ने जब यह संकल्प लिया तब उन्हें  संभावित तौर पर यह जानकारी कतई नहीं थी कि सिंध का नाश हो चुका है और सिंध मडीखेड़ा इंटकबैल में मरी पड़ी हुई है। उन्होंने मृत सिंध में अपने कर्म बल से प्राण फूंकना शुरू किया और तकरीबन एक वर्ष की अथक मेहनत के बाद उन्होंने सिंध को ग्वालियर वायपास ला दिया। उनकी जीवटता और संकल्प का यह जोर था कि भले ही एक बार सही सिंध का पानी कुछ वार्डों में नलों की टोटियों से भी पहुंचा। अगर इसे आंशिक सफलता भी मान लिया जाए तो इस सफलता की प्राप्ति में श्रीमंत के संघर्ष का एक बड़ा अध्याय देखा और पढ़ा जा सकता है। श्रीमंत ने लगतार आ रही बाधाओं और कानूनी अड़चनों को दूर करने के लिए जो कुछ किया वह करना किसी भी अच्छे खासे को थका देता! हताश कर देता। हार मानने पर मजबूर कर देता लेकिन श्रीमंत हार नहीं मानती। हताश नहीं होती और इसी दम पर उन्होंने मृत पड़ी सिंध को जीवित करके नलों की टोंटी तक पहुंचाकर यह साबित कर दिया कि जनहित से बड़ा कोई धर्म नहीं है और परहित से बड़ा कोई पुण्य नहीं है। जब जनहित और परहित के लिए कार्य किया जाता है तो ईश्वर भी साथ देता है। तथ्य यह भी है कि श्रीमंत मड़ीखेड़ा इंटकबैल से वायपास और पानी की टंकियों से नलों तक जो पानी लाई हैं वह असंभव था। सच्चाई यह है कि पाईप लाईन छितरी-उखड़ी हुई पड़ी थी। कई पाईप ज्वाईंटों से निकल कर हवा में लहरा रहे थे। इंटकबैल की स्थिति और भी दयनीय थी। ऐसे कई बड़े कारणों के अतिरिक्त  कई कानूनी प्रक्रियायें भोपाल और दिल्ली स्तर पर फंसी हुई थी। श्रीमंत ने हिम्मत और अपने प्रभाव से जो परिणाम पाए वह ईमानदारी से शिवपुरी की जनता के लिए अपर्याप्त थे लेकिन उन्हें इस तथ्य का सुख था कि कोई है जो उनके लिए दिन रात एक कर रहा है उसकी मेहनत के परिणाम आ रहे हैं। जनता के संतोष से इतर कई वर्ग ऐसे भी हैं जो परिणामों को नाकाफी ठहराकर आए परिणामों को कठघरे में खड़ा करते रहे! मांगें बदलते रहे। नजीर देखें, अभी तक नहीं आया फिल्टर तक पानी!  आ गया तो बदली मांग अभी तक नहीं आया वायपास तक पानी। वायपास पर आ गया तो बोले कब भरेगा टंकियों में पानी। टंकियों में भरा तो नलों में कब आयेगा पानी। नलों में आ गया तो सवाल उछाला गया रोजाना कब आयेगा पानी! रोजाना पानी नलों से आए इस प्रक्रिया में जब काम किया गया तो बिछी पाईप लाईन के दोष उजागर होना शुरू हो गए। पाईप फटे! लीकेज हुए उनकी मरम्मतें की। जहां पाईपों को बदला जाना था वहां पाईप बदले जाने शुरू हुए। यह सब चल ही रहा था तभी पब्लिक पार्लियामेंट खड़ी हो गई। हम धरना देंगे! प्रमुख दो मांगों की पृष्ट भूमि में कहा गया कि शिवपुरी की जनता के साथ बहुत अन्याय हुआ है। सही है हुआ है तो आप कौन से न्याय प्रद हो! जब मृत पड़ी सिंध जीवित हो गई! पानी वायपास पर और टंकियों से नलों में आने की शुरूआत हो गई तो जिसने(श्रीमंत) यह सब किया और कर रहीं हैं उन पर विश्वास और उनका साथ देने की जगह धरना प्रदर्शन का अन्याय क्यों?  जवाब जो भी लेकिन सभी को यह तथ्य समझना होगा कि शिवपुरी में सिंध की सफलता का पर्याय सिर्फ और सिर्फ श्रीमंत हैं अधिकांश जनता यह जानती और मानती है राजनीति की बात कुछ और है।

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