“ये बंद कराने आये थे,तबायफो के कोठे मगर सिक्को की खनक देखकर, खुद ही नाच बैठे”

मध्यप्रदेश ब्यूरो कृष्ण कुमार गुप्ता
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सोनांचल रिपोर्टर-ये केजरीवाल जैसो के लिए ही शायद गालिब ने कभी लिखा था ।केजरीवाल जब अन्ना आंदोलन में जुड़े थे। तब उनकी भाषा राजनैतिक ना होकर के सामाजिक थी। उनका कहना था वह ना ही कभी किसी राजनैतिक पद को लेंगे और ना ही कभी चुनाव लड़ेंगे, क्योंकि कुर्सी में बैठने वाला हर इंसान बदल जाता है और उसकी मानसिकता ऐसी ही हो जाती है यह किसी और के कहे नहीं उन्हीं के शब्द थे।

【केजरीवाल का राजनैतिक दल】

अपनी कही गई बातों को भुलाते हुए, केजरीवाल ने राजनैतिक दल बनाया और उन्होंने कहा कि वह अब इस देश की राजनीति को एक नया आयाम देंगे और एक नई राजनीति की शुरुआत करेंगे। जिसमें स्वच्छता, नैतिक चरित्र एवं जवाबदेही का लोगों को एहसास होगा। जिसमें जात-पात, धर्म और लालच की राजनीति नहीं होगी। वह सत्ता के लिए नहीं बल्कि एक राजनैतिक आंदोलन के लिए काम करेंगे इसलिए वर्तमान समय में स्थापित किसी भी राजनीतिक दल के साथ वह नहीं जाएंगे बल्कि वहां के अच्छे लोगों को अपने राजनैतिक दल के साथ जोड़ने की कोशिश करेंगे।

【दिल्ली का पहला चुनाव खत्म】

दिल्ली का पहला चुनाव खत्म हुआ। उनकी यह सारी बातें निराधार साबित हो गई जिस राजनैतिक दल को सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी दल घोषित किया था उसी राजनैतिक दल की सहायता से पहली बार सरकार में आए। लेकिन दोनों का स्वार्थ इतने बड़े थे कि कुछ ही महीनों में सरकार गिर गई। जिसमें खुद को उन्होंने त्यागी इंसान का चोला पहनकर अटल बिहारी वाजपेई जैसा बनने की नाकाम कोशिश थी। अटल जी वो इंसान थे जो हक से जिसके भी कंधे में हाथ रख देते, वह उनकी पार्टी की तरफ चला आता और समर्थन भी दे देता। लेकिन उन्होंने एक सांसद की कमी होने पर अपनी सरकार से त्यागपत्र दे दिया और फिर चुनाव में चले गए थे।

【आंदोलन से जन्मी पार्टी का विश्वास】

बल्कि वह कैलकुलेशन था जो अब समझ में आ चुका था जब पहले चुनाव में यह गए थे तब इनको लगा था कि आंदोलन से जन्मी पार्टी को लोगों का कितना विश्वास मिलेगा 15 से 20 सीटें ही विधानसभा में आएगी। इसलिए विपक्ष के रूप में बैठना ही पड़ेगा। इसलिए इन्होंने सारी बातें कहीं लेकिन जैसे ही सत्ता से कुछ दूरी पर यह रुके उनके मन में सत्ता का लालच उछाल मारने लगा।

जिसको गालियां देकर सारे नेताओं को भ्रष्ट बताकर जीत कर आए थे। इतना ही नहीं उनके साथ ना जाने के लिए अपने बच्चों की कसम तक खा ली थी। लेकिन जब आप और कांग्रेस के आपसी स्वार्थ टकराने लगे तो सत्ता की नई कहानी लिखी गई। क्योंकि तब तक जमीनी कैलकुलेशन बता चुका था कि जनता स्वच्छ राजनीति और नए तरीके की राजनीति को चाहती है। इसलिए यह फिर से चुनाव में गए और इस बार केजरीवाल ने राजनीति के उन सारे हथकंडे को छुआ, जिनका कभी वह विरोध करते थे। लेकिन तब लोगों को यह सब समझ नही आया।

【दूसरी बार सत्ता और प्रचंड बहुमत】

हासिल होते ही अब पूरी तरह से केजरीवाल और उसकी चौकड़ी समझ चुकी थी की वह पूर्णता राजनैतिक रंग को हासिल कर चुके हैं। अब उनको जैसे ही एहसास हुआ की अब इस भारी-भरकम सत्ता को उन लोगों के साथ बांटना भी पड़ेगा। जिन्होंने आंदोलन के दौरान और पार्टी को खड़े करते वक्त उनके साथ थे। ये वो लोग थे जिन्होंने चेहरे के अलावा सबसे ज्यादा यदि किसी का लगा था तो इन्हीं का लगा था चाहे धन हो चाहे जनसंपर्क हो चाहे रणनीति हो, केजरीवाल की सोच को जमीन पर उतारने का काम इन्हीं सब ने किया था। सिर्फ उन्होंने अपने आप को पीछे करके चेहरा केजरीवाल को बनाया था तब उन्होंने उन सारे सक्षम लोगों का एक-एक करके विकेट गिराना शुरू किया। फिर उसमें ना बचपन की दोस्ती टिकी ना ही गुरु का सम्मान, न सामाजिक सम्बंध……

【टिके वह लोग जिन्होंने सर के सामने सर झुकाया】

कुर्सी के सामने खड़े रहे, इशारों में काम करना सीखा, जिनके हाथ कंधों की बजाय घुटने के नीचे की ओर गए और पुराने साथियों के पीठ की ओर……..🗡📌
इसके साथ ही शुरू हो गई वही स्वार्थ वाली परंपरागत राजनीति और दफन हो गई नैतिकता, चरित्र और स्वच्छता की राजनीति…….. तब मेरे जैसे लाखों करोड़ों युवाओं के उन आशाओं का कत्ल हो गया जिन्होंने एक आशा की उम्मीद देखी थी कि चलो कोई एक ऐसा आएगा। जिसे सत्ता की बजाय मुद्दों और समस्याओं के सही समाधान से प्यार होगा।
【लेकिन वो न हो सका】 जनाब ने जालीदार टोपी पहननी शुरू कर दी, आवश्यकता पड़ने पर तिलक लगाना शुरू कर दिया, अपने को बनिया भी बता दिया, सेना को गाली भी दिलवा दी, सेना को बलात्कारी करने वालों की केस दबा कर रख लिए, सेना से सबूत भी मांग लिए भारत माता की जय के नारे लगाते-लगाते, अब उसको खंडित करने वालों के साथ खड़े भी हो गए, पत्थरबाजों से मोहब्बत हो गई, अन्ना-विश्वास से दूरी हो गई और वह लोकपाल जिसके लिए यह सब हुआ था जिससे इन सब का जन्म हुआ था। उसे पाताल लोक में ले जाकर के डुबाकर समाधि दे दी।
【लोग कहते हैं कि दिल्ली में काम हुआ】ज्यादा कहो तो बताते हैं कि उस दल में भी ऐसा है उस दल में भी ऐसा है तुम्हारे दल में भी ऐसा हैं अब केजरीवाल की पूरी पार्टी ही ऐसा कहती है। क्या इसी राजनीति के लिए इनको लाया गया था की ये दूसरे की तरफ ऊगली दिखाये। यदि ऐसा ही होता तो इनको लाने की क्या जरूरत थी पहले से इतने सारे दल हैं और हर दल जिसकी भी सरकार बनती हैं। वो विकास से जुड़े कुछ न कुछ काम तो करता ही हैं।
यदि वो ऐसा नही करेगा तो वह उन अपनों को भी लाभ नहीं दे पाएगा। जिनके कारण व जीतकर आया है और न ही उनको वह नाम और सम्मान हासिल होगा जिसको वह पाना चाहते हैं।


【सिर्फ विकास ही सत्ता】 का मापदंड होता तब तो मुगल काल में भी सत्ताधारी मुगल राजाओं ने मजबूत सड़के बनवाई, बड़े धर्मशालाये बनवाई, कुएं तलाब बनवाये जरूरत के हिसाब से बहुत सारी चीजों का निर्माण करवाया, जब अंग्रेज आए उन्होंने देश के अंदर ट्रेन की लाइनें बिछाई, सड़क मार्ग का विकास किया, वह सारे काम किए। जिससे जीवन सुखमय और सुविधामय हो सके। क्योंकि इन सारी चीजो देकर की एक बड़ी जनसंख्या को संतुष्ट व शांत रखना चाहते थे। लेकिन देश की जागरूक जनता ने उनका विरोध किया राष्ट्रवाद को प्रथम रखा अपने स्वाभिमान की अलख को जलाए रखा। महाराणा प्रताप ने सब कुछ होते हुए घास की रोटी तक खाई, शिवाजी जी महाराज ने अंग्रेजो का विरोध करते हुए भगवा परचम लहराया, महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, मंगल पांडे ने विद्रोह किया, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, लाला लाजपत राय, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान जैसे अनगिनत वीरों ने अपनी शहादत दी और हजारों-लाखों लोगों ने जिलों में कड़ी सजा भोगी।
【लेकिन इनमें से】किसी ने भी भारत को खंडित करने वालों के साथ, भारत को तोड़ने की और काटने की बात करने वाले लोगों के साथ, उनका समर्थन करने वाले लोगों के साथ खड़ा होना तो दूर उनका जिंदा रहना भी मंजूर नहीं किया। लेकिन आज अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ लोग उनका समर्थन करके सत्ता पाना चाहते हैं और जनता का एक समूह भी अपने इतिहास से सबक न लेकर के उसी गलती को दोहरान में लगा है जो इतिहास में कई बार दोहराई गई है।
जबकि सत्ता या संगठन का चरित्र पहले राष्ट्रवाद प्रथम, फिर विकास, फिर समाज, फिर दल होना चाहिए। जो मुझे वर्तमान केजरीवाल में कही नही दिखता उनके लिए सत्ता ही प्रथम हैं।

【केजरीवाल कहते है काम तो किया हैं】
आइए अब उनके काम के चरित्र पर बात करते है। सबसे बड़े मुद्दे फ्री पानी, फ्री बिजली और महिलाओं को फ्री बस, क्या यही वह स्वच्छ राजनीति और चरित्र का चेहरा है जिसकी बात करके वह आंदोलन कर रहे थे या राजनैतिक दल बना कर आये थे। यदि आपको लोगों का सहयोग करना है जरूरतमंदों को सहायता देनी है तो आपको बिल्कुल देनी चाहिए। हर सरकार को देना चाहिए, आप कहते हैं कि गरीबी को फ्री देगे, थोड़ा सक्षम को नार्मल सब्सिडी के साथ देगे और समर्थ लोगों को एक्चुअल पैसे में देगे। उन पैसों को दिल्ली के विकास में अच्छे से लगाया जा सकता था फ्री के गंदे पानी से मुक्ति मिल सकती थी, 200 से ऊपर के टैरिफ यूज करने वाले लोगों को कम पैसे देने के ऑप्शन मिल सकते थे, बसों मे फ्री बैठकर कोन वाली आइसक्रीम वाली महिलाओं से पैसे लेकर के सभी गरीबों को फ्री सफर दिया जा सकता था। उसमें वह बुजुर्ग पुरुष भी शामिल होते जिनके पैरों में चप्पल भी नहीं, इनमें वह छात्र भी शामिल होते जो गरीबी के कारण पैदल चलकर अपनी कॉलेज और स्कूलों तक जाते हैं। जिन पैसों की कमी का रोना साढ़े 4 साल तक रोते रहे। उसे पूरा किया जाता लेकिन ऐसा नही किया। नैतिकता अब खत्म हो गई और कैसे भी सत्ता हासिल करने की राजनीति की .

एक बार इस फ्री की आदत डालने के बाद क्या किसी पार्टी में एकदम से इतनी हिम्मत आएगी कि उसे वापस ले सके, क्या देश की राजनीति में फिर से जयललिता और करुणानिधि का वही कल्चर नहीं दिया जा रहा जिसमें सोने की चैन, टीवी, पायल, साड़ी देकर के लोगों ने चुनाव जीता। जो लोग इसे विकास बताते हैं उनसे बड़ा मूर्ख मुझे दुनिया में नजर नहीं आता 6 महीने के अंदर हर चीज को फ्री फ्री फ्री करके यदि कोई चुनाव जीत जाता है तो उसके विकास की जीत कैसे….? क्या अब पूरे देश में ऐसे ही फ़्री देने की राजनीति नही शुरू हो जाएगी। विकास हुआ या नही उससे मतलब नही रहेगा। जीत के वोटों का % अब लीगली खरीद नही लिया जाएगा ? सच में अपने वादों पर इतना काम और विकास किया होता तो यह फ्री देने की जरूरत पड़ी ही क्यो होती। कल यदि ये जीत हुई तो मैं ये मानता हूँ कि ये राष्ट्रवाद को दांव में लगाकर खरीदी हुई जीत होगी विकास की नही।

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